तमिलनाडु में हाल ही में मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने 2026-27 के लिए NEET-UG परीक्षा को समाप्त करने की मांग की है। यह घोषणा एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में की गई, जिसमें उन्होंने इस परीक्षा को गरीब और ग्रामीण छात्रों के लिए असमानता का कारण बताया। स्टालिन का कहना है कि ऐसी परीक्षाओं के कारण सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े छात्रों को अवसर नहीं मिल पाते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि मेडिकल दाखिले केवल 12वीं कक्षा के अंकों के आधार पर होने चाहिए, जिससे सभी छात्रों को समान अवसर मिल सके।
मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने अपनी बात को स्पष्ट करते हुए बताया कि NEET परीक्षा का स्वरूप गरीब एवं ग्रामीण छात्रों के लिए बेहद कठिन है। उन्होंने आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि बहुत से योग्य छात्र इस परीक्षा में सफल नहीं हो पाते, जिससे उनका करियर प्रभावित होता है। इसके विपरीत, जिन छात्रों के पास बेहतर शहरी संसाधन हैं, वे अधिकतर इस परीक्षा में सफल हो जाते हैं। इस प्रकार, स्टालिन ने इस परीक्षा को शिक्षा के क्षेत्र में असमानता के प्रतीक के रूप में चित्रित किया।
इस विषय पर चर्चा करते समय, हमें यह समझना होगा कि NEET परीक्षा का इतिहास क्या है। यह परीक्षा 2013 में भारतीय चिकित्सा परिषद द्वारा शुरू की गई थी, जिसका उद्देश्य चिकित्सा शिक्षा में समानता लाना था। हालांकि, समय के साथ यह परीक्षा विवादों में घिरती गई, खासकर उन छात्रों के लिए जो ग्रामीण क्षेत्रों से आते हैं। इसके कारण कई राज्यों ने इस परीक्षा के खिलाफ आवाज उठाई, लेकिन तमिलनाडु ने इस मुद्दे को अपने अधिकारों के संदर्भ में उठाया है।
राज्य सरकार ने इस मांग को लेकर केंद्रीय सरकार से भी सहयोग की अपील की है। स्टालिन ने कहा कि राज्यों को अपने शिक्षा प्रणाली और दाखिले की प्रक्रिया को निर्धारित करने का अधिकार होना चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि यह एक संवैधानिक अधिकार है, जिससे राज्य की संस्कृति और आवश्यकताओं के अनुसार शिक्षा नीति बनाई जा सके। राज्य सरकार ने यह भी कहा कि वे इस मुद्दे पर सभी आवश्यक कानूनी कदम उठाने के लिए तैयार हैं।
विशेषज्ञों की राय भी इस विषय पर महत्वपूर्ण है। कई शिक्षा शास्त्री और नीति विश्लेषक इस बात से सहमत हैं कि NEET परीक्षा को समाप्त करने से छात्रों को अधिक अवसर मिलेंगे। उनके अनुसार, इस तरह की परीक्षाओं का उद्देश्य शिक्षा प्रणाली में समानता लाना होता है, लेकिन परिणाम इसके विपरीत हैं। वे यह भी मानते हैं कि 12वीं कक्षा के अंकों के आधार पर दाखिले से छात्रों को अपनी मेहनत के अनुसार अवसर मिलेगा।
इस मुद्दे पर जनता की प्रतिक्रिया भी काफी उत्साहजनक रही है। कई छात्रों और अभिभावकों ने स्टालिन के इस कदम का समर्थन किया है। उनका मानना है कि NEET परीक्षा ने बहुत से योग्य छात्रों के सपनों को तोड़ा है। इसके विपरीत, 12वीं कक्षा के अंकों के आधार पर दाखिले से ज्यादा छात्र मेडिकल क्षेत्र में आ सकेंगे। इससे न केवल छात्रों को बल्कि समाज को भी लाभ होगा।
इस विषय पर और भी जानकारी प्राप्त हो रही है, जिसमें कुछ अन्य राज्य भी NEET परीक्षा के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। इस प्रकार, यह एक ऐसा मुद्दा बनता जा रहा है, जो सिर्फ तमिलनाडु तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे देश में शिक्षा प्रणाली में सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। कई राज्य सरकारें इस पर विचार कर रही हैं कि कैसे वे अपनी चिकित्सा शिक्षा नीति को बेहतर बना सकते हैं।
भविष्य की संभावनाओं के संदर्भ में, यह देखना दिलचस्प होगा कि केंद्र सरकार इस मांग पर क्या प्रतिक्रिया देती है। यदि तमिलनाडु की मांग को स्वीकार किया जाता है, तो यह अन्य राज्यों को भी प्रेरित कर सकता है। इससे यह स्पष्ट होगा कि शिक्षा प्रणाली में सभी छात्रों को समान अवसर मिलना चाहिए। हम उम्मीद करते हैं कि इस मुद्दे पर सकारात्मक चर्चा होगी, जिससे छात्रों के भविष्य को बेहतर बनाने में मदद मिलेगी।
