हाल ही में, तमिल Nadu के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने 2026-27 के शैक्षणिक वर्ष के लिए NEET-UG परीक्षा को समाप्त करने की मांग की। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि यह परीक्षा गरीब और ग्रामीण छात्रों के लिए एक बड़ी बाधा बन गई है। यह बयान उन्होंने एक सार्वजनिक समारोह के दौरान दिया, जिसमें उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में सुधार की आवश्यकता पर जोर दिया। उनका यह कदम राज्य में शिक्षा के अधिकारों के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है।
स्टालिन के अनुसार, NEET परीक्षा का प्रारूप ऐसे छात्रों को हतोत्साहित करता है, जो आर्थिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि से आते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि 12वीं कक्षा के अंकों के आधार पर मेडिकल दाखिला देना ज्यादा उचित होगा। उनका यह कहना है कि इस तरह से छात्रों की वास्तविक क्षमता का आकलन किया जा सकेगा। आंकड़ों के अनुसार, NEET परीक्षा में भाग लेने वाले छात्रों में से अधिकांश शहरों से आते हैं, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों के छात्रों की संख्या अपेक्षाकृत कम है।
इस मुद्दे की पृष्ठभूमि में यह बात भी है कि तमिल Nadu में शिक्षा का स्तर और प्रवेश के मानदंड हमेशा से विवादित रहे हैं। पहले भी कई बार इस प्रकार के मुद्दे उठाए जा चुके हैं, जिनमें राज्य की शिक्षा प्रणाली में सुधार की मांग की गई है। NEET परीक्षा को लेकर विभिन्न राज्यों में भी विरोध देखने को मिला है। स्टालिन का यह कदम एक बार फिर इस विमर्श को तेज कर सकता है।
इस मांग पर राज्य सरकार ने अपनी स्थिति स्पष्ट की है। स्टालिन ने कहा कि राज्य को अपने शिक्षा संबंधी निर्णय लेने का अधिकार होना चाहिए। उन्होंने केंद्र सरकार से अपील की कि राज्यों को अपनी जरूरतों के अनुसार नीति बनाने की स्वतंत्रता दी जाए। यह एक ऐसा मामला है, जिसमें राज्य और केंद्र के बीच विचारधारा की टकराहट देखने को मिल रही है।
शिक्षा के विशेषज्ञों ने इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया दी है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि NEET परीक्षा ने शिक्षा के क्षेत्र में असमानता को बढ़ावा दिया है। उन्होंने कहा कि इससे केवल उन छात्रों को फायदा हुआ है, जो बेहतर संसाधनों से लैस हैं। ऐसे में, 12वीं कक्षा के अंकों के आधार पर दाखिला देने की नीति अधिक उचित दिखती है।
इस मुद्दे का प्रभाव जनता पर भी पड़ रहा है। ग्रामीण छात्रों के अभिभावक इस बात को लेकर चिंतित हैं कि उनके बच्चे इस परीक्षा में सफल नहीं हो पा रहे हैं। इसके चलते, कई छात्रों ने मेडिकल करियर के अपने सपने छोड़ दिए हैं। इस स्थिति ने शिक्षा में असमानता को और बढ़ा दिया है, जो समाज के लिए चिंताजनक है।
इस संदर्भ में, अन्य राज्यों ने भी NEET परीक्षा को लेकर अपने विचार व्यक्त किए हैं। कुछ राज्य पहले ही इस परीक्षा के खिलाफ आवाज उठा चुके हैं और स्थानीय स्तर पर अपने दाखिला प्रक्रिया को लागू किया है। इस मुद्दे को लेकर विभिन्न छात्र संगठनों ने भी प्रदर्शन किए हैं, जो इस बात का संकेत है कि यह एक व्यापक समस्या बनती जा रही है।
भविष्य में, यदि स्टालिन की मांग को स्वीकार किया जाता है, तो यह तमिल Nadu की शिक्षा प्रणाली में एक महत्वपूर्ण बदलाव ला सकता है। संभावित रूप से, अन्य राज्य भी इस दिशा में कदम बढ़ा सकते हैं। इस विषय पर आगे की चर्चा और निर्णय निश्चित रूप से शिक्षा के क्षेत्र में समानता की ओर एक महत्वपूर्ण कदम होगा। यह देखना दिलचस्प होगा कि केंद्र सरकार इस मांग पर क्या प्रतिक्रिया देती है।
