सिक्किम स्थापना दिवस के अवसर पर उपराष्ट्रपति ने जैविक खेती के महत्व पर जोर दिया। यह कार्यक्रम हाल ही में सिक्किम में आयोजित किया गया। उपराष्ट्रपति ने इस अवसर पर जैविक खेती को कृषि सुधार नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक क्रांति बताया।
उपराष्ट्रपति ने कहा कि जैविक खेती केवल एक कृषि पद्धति नहीं है, बल्कि यह समाज में एक नई सोच और दृष्टिकोण लाने का माध्यम है। उन्होंने किसानों को इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। कार्यक्रम में विभिन्न कृषि विशेषज्ञों और स्थानीय किसानों ने भी भाग लिया।
सिक्किम ने 2003 में जैविक खेती को अपनाया था और यह राज्य अब पूरी तरह से जैविक कृषि के लिए जाना जाता है। यह पहल न केवल पर्यावरण संरक्षण में सहायक है, बल्कि किसानों की आय में भी सुधार लाने में मददगार साबित हुई है। जैविक खेती के माध्यम से सिक्किम ने एक नई पहचान बनाई है।
उपराष्ट्रपति ने इस अवसर पर राज्य सरकार की पहल की सराहना की और कहा कि यह अन्य राज्यों के लिए एक उदाहरण बन सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए सभी स्तरों पर सहयोग की आवश्यकता है।
इस कार्यक्रम का स्थानीय लोगों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। जैविक खेती के माध्यम से किसानों की आय में वृद्धि हुई है और पर्यावरण की स्थिति में सुधार आया है। लोग अब जैविक उत्पादों की ओर अधिक आकर्षित हो रहे हैं।
सिक्किम में जैविक खेती को लेकर कई अन्य विकास भी हो रहे हैं। राज्य सरकार ने किसानों के लिए विभिन्न योजनाएं और प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किए हैं। इसके अलावा, जैविक उत्पादों की मार्केटिंग के लिए भी नए अवसर उत्पन्न हो रहे हैं।
आगे की योजना में जैविक खेती के क्षेत्र में और अधिक शोध और विकास शामिल है। राज्य सरकार ने इस दिशा में और कदम उठाने का संकल्प लिया है। इसके साथ ही, अन्य राज्यों को भी इस मॉडल को अपनाने के लिए प्रेरित किया जाएगा।
सिक्किम स्थापना दिवस पर उपराष्ट्रपति का यह बयान जैविक खेती के महत्व को उजागर करता है। यह न केवल कृषि सुधार का एक हिस्सा है, बल्कि एक सांस्कृतिक परिवर्तन का प्रतीक भी है। सिक्किम का यह मॉडल अन्य राज्यों के लिए प्रेरणा स्रोत बन सकता है।
