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आपातकाल को अमित शाह ने बताया काला अध्याय

अमित शाह ने 1975 के आपातकाल को काला अध्याय बताया। उन्होंने कांग्रेस पर संविधान की आत्मा को कुचलने का आरोप लगाया। यह बयान एक राजनीतिक संदर्भ में दिया गया।

25 जून 20262 घंटे पहलेस्रोत: शुक्रवार डेस्क0 बार पढ़ा गया
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केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 1975 के आपातकाल को इतिहास का काला अध्याय बताया है। उन्होंने यह टिप्पणी हाल ही में एक कार्यक्रम के दौरान की, जिसमें उन्होंने कांग्रेस पार्टी पर तीखा प्रहार किया। शाह ने कहा कि आपातकाल के दौरान संविधान की आत्मा को कुचला गया था।

अमित शाह ने अपने बयान में यह भी कहा कि आपातकाल के समय देश में लोकतंत्र का गला घोंटा गया था। उन्होंने कांग्रेस के नेतृत्व में हुए इस घटनाक्रम को देश के लिए एक गंभीर संकट के रूप में देखा। शाह का यह बयान उस समय आया है जब देश में राजनीतिक चर्चाएँ तेज हो रही हैं।

1975 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल ने भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ लाया था। इस दौरान नागरिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ और कई विपक्षी नेताओं को जेल में डाल दिया गया। आपातकाल को लेकर आज भी विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच मतभेद हैं।

अमित शाह ने अपने बयान में कांग्रेस पार्टी के प्रति अपनी आलोचना को स्पष्ट किया है। उन्होंने कहा कि इस पार्टी ने लोकतंत्र की नींव को कमजोर किया है। हालांकि, इस पर कांग्रेस पार्टी की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।

इस घटनाक्रम का आम लोगों पर गहरा असर पड़ा है। आपातकाल के दौरान कई लोगों ने अपने अधिकार खो दिए थे और यह घटना आज भी लोगों की यादों में ताजा है। शाह के बयान ने इस विषय पर फिर से चर्चा को जन्म दिया है।

इस बीच, राजनीतिक हलकों में इस बयान को लेकर विभिन्न प्रतिक्रियाएँ आ रही हैं। कुछ नेता इसे सही ठहरा रहे हैं, जबकि अन्य इसे राजनीतिक लाभ के लिए किया गया प्रहार मान रहे हैं। यह घटनाक्रम आगामी चुनावों के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण हो सकता है।

आगे क्या होगा, यह देखना दिलचस्प होगा। क्या कांग्रेस इस पर कोई प्रतिक्रिया देगी या इसे अनदेखा करेगी? आगामी राजनीतिक घटनाक्रम इस मुद्दे को और भी जटिल बना सकते हैं।

अंत में, अमित शाह का यह बयान आपातकाल के इतिहास को फिर से जीवित करता है। यह न केवल कांग्रेस के प्रति एक आलोचना है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण चर्चा का विषय भी है। आपातकाल की घटनाएँ आज भी भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण संदर्भ बनी हुई हैं।

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