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परीक्षा या अवसर, मुद्दा या मौका? शोधार्थी के नजरिए से देश का सबसे बड़े मुद्दा

अभिषेक मिश्र (शोधार्थी, टाइम्स स्कूल ऑफ मीडिया) बेनेट यूनिवर्सिटी (द टाइम्स ग्रुप)

26 जुलाई 20261 घंटे पहलेस्रोत: शुक्रवार डेस्क0 बार पढ़ा गया
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नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) द्वारा 3 मई 2026 को आयोजित नीट यूजी परीक्षा का पेपर लीक होना आज देश के सबसे गंभीर और चर्चित मुद्दों में से एक बन गया है। इस कथित पेपर लीक के बाद कई अभ्यर्थियों द्वारा की गई आत्महत्या, कॉक्रोच जनता पार्टी का उदय, जेन ज़ी प्रोटेस्ट, भूंख हड़ताल, सड़क मार्च, लाठीचार्च, आंसू गैस के गोले और लाखों सवालों के घेरे में सरकार को बचाने के क्रम में प्रधान ने इस्तीफा दे दिया है।

1984 की तस्वीर से 2026 की बहस तक

अनशन के दौरान वायरल एक तस्वीर ने प्रधानमंत्री मोदी और वर्तमान सरकार को हठी साबित करने का प्रयास किया और उससे जुड़े दावों ने सोशल मीडिया पर एक नई राजनीतिक बहस को जन्म दे दिया। 1984 में जब सोनम वांगचुक के पिता सोनम वांग्याल लद्दाख को अनुसूचित जाति का दर्जा दिलाने के लिए अनशन पर बैठे थे, तब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने स्वयं जाकर उनकी भूंख हड़ताल समाप्त की थी। लोग इस ऐतिहासिक प्रसंग की तुलना वर्तमान परिस्थितियों से करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार की जवाबदेही पर सवाल उठा रहे हैं। सवाल यह भी है कि जब अतीत में किसी आंदोलनकारी की मांगों को गंभीरता से लेते हुए देश के प्रधानमंत्री स्वयं हस्तक्षेप कर सकते थे, तो आज युवाओं और अभ्यर्थियों से जुड़े इतने गंभीर मुद्दे पर सरकार की प्रतिक्रिया क्या होनी चाहिए?

परीक्षा केवल प्रश्नपत्र और उत्तर पुस्तिका के बीच का संबंध नहीं है। यह उस भरोसे का नाम है, जो एक विद्यार्थी पूरी व्यवस्था पर करता है। जब वही भरोसा टूटता है, तो सवाल केवल एक परीक्षा का नहीं रहता—सवाल पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता का बन जाता है। ऐसे में सरकार की जिम्मेदारी केवल परीक्षा आयोजित कराने की नहीं, बल्कि उस भरोसे को बहाल करने की भी है।

सिविल ड्रेस, हवाई चप्पल और हाथ में पुलिस वाला डंडा, प्रोटेस्टर्स को किसका संदेश?

20 जुलाई को हुए इस प्रोटेस्ट के दौरान पुलिस द्वारा लाठीचार्ज, आंसू गैस के गोले मारने जैसे वीडियोज भी सोशल मीडिया पर सामने आए । लेकिन साथ ही कुछ तस्वीरें देश में चर्चा का विषय बन गई। बिना किसी वर्दी के हाथ में पुलिस वाला डंडा लेकर हवाई चप्पल पहने हुए लोग आखिर कौन हैं? किस मकसद से वहां खड़े थे? और प्रोटेस्टर्स को यह क्या संदेश देना चाहते हैं? मैं एक शोधार्थी हूं। लंबे समय से दुनिया में हो रहे विरोध और उनके परिणामों का आंकलन कर रहा हूं। मेरे ओपिनियन में नेपाल और बांग्लादेश जैसी संभावित स्थिति को देखते हुए सत्ता में बैठी राजनीतिक पार्टियां ये संदेश देने का प्रयास कर सकती हैं कि उनके साथ भी ऐसे संगठन हैं

जो पुलिस बल का प्रयोग किए बिना भी वह प्रत्येक स्थिति का सामना करने में सक्षम हैं। और यह संदेश प्रोटेस्टर्स के लिए न होकर इस प्रोटेस्ट को पर्दे के पीछे से ताकत दे रहे उन छात्र संगठनों के लिए हो सकता है, जो इससे पहले भी विभिन्न मुद्दों पर इस सरकार के खिलाफ कुछ न कुछ गतिविधि करते रहे हैं। कभी जेएनयू से विवादित नारे प्रकाश में आए, कभी आरएसएस मुर्दाबाद तो कभी ब्राह्मणवाद से आजादी की बात भी होती चली आ रही है। विषय जनता का है लेकिन लीड कर रहे चेहरो ने इस प्रोटेस्ट को कई विचारधारा के एजेंडा का ऐंगल दिया है, इस मौके का लाभ सरकार में बैठी पार्टी भी पूरी तरह से उठाना चाहेगी।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 25 दिसंबर 2009 को रिलीज हुई फिल्म 3 इंडियट्स को लेकर अभिनेता आमिर खान ने बाद में यह स्पष्ट किया कि फिल्म की कहानी सीधे तौर पर सोनम वांगचुक की जीवन यात्रा पर आधारित नहीं थी। हालांकि, फिल्म के किरदार ‘फुंसुक वांगडू’ और सोनम वांगचुक के नाम के बीच समानता तथा शिक्षा के क्षेत्र में उनके प्रयोगों को लेकर लंबे समय से यह धारणा बनी रही कि फिल्म का किरदार उनसे प्रेरित था। यही वजह है कि आमिर खान के इस बयान को लेकर भी सवाल उठे कि यह केवल एक रचनात्मक स्पष्टीकरण था या इसके पीछे कोई व्यापक राजनीतिक संदर्भ भी था।

सवाल यह है कि क्या समय के साथ बॉलीवुड की सार्वजनिक बयानबाजी भी राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनती जा रही है? या फिर किसी फिल्म और उसके वास्तविक प्रेरणास्रोत के बीच समानता को राजनीतिक चश्मे से देखने की प्रवृत्ति ही इस पूरे विवाद को जन्म देती है? इन सवालों के जवाब जितने महत्वपूर्ण हैं, उतना ही महत्वपूर्ण यह भी है कि कला, राजनीति और सार्वजनिक व्यक्तित्वों के बीच की सीमाएं लगातार धुंधली होती जा रही हैं।

लेखक के बारे में: अभिषेक कुमार मिश्र बेनेट यूनिवर्सिटी के टाइम्स स्कूल ऑफ मीडिया में पीएचडी के छात्र हैं। इन्होंने बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय से जनसंचार एवं पत्रकारिता से परास्नातक की उपाधि प्राप्त की है। इसी विषय से अभिषेक दो बार यूजीसी नेट की परीक्षा भी उत्तीर्ण कर चुके हैं। यह संपादकीय लेखक की व्यक्तिगत राय पर आधारित है

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