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भारत में एनजीओ की संख्या में कमी, विदेशी चंदा बढ़ा

भारत में पिछले 10 वर्षों में पंजीकृत एनजीओ की संख्या आधी हो गई है। इस दौरान विदेशी अंशदान में वृद्धि हुई है। एक विशेष संगठन को 500 करोड़ रुपये का चंदा मिला है।

18 सितंबर 2026 • 18 सितंबर 2026स्रोत: शुक्रवार डेस्क14 बार पढ़ा गया
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भारत में पिछले 10 वर्षों में पंजीकृत गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) की संख्या में काफी कमी आई है। इस अवधि में एनजीओ की संख्या आधी होकर रह गई है। वहीं, विदेशी अंशदान में वृद्धि दर्ज की गई है, जो इस क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण बदलाव को दर्शाता है।

हाल ही में एक संगठन को 500 करोड़ रुपये का चंदा मिला है, जो विदेशी अंशदान के बढ़ते प्रवृत्ति का एक उदाहरण है। यह चंदा विभिन्न स्रोतों से आया है और इसे एनजीओ की गतिविधियों के लिए उपयोग किया जाएगा। इस प्रकार के चंदे से एनजीओ को अपने कार्यों को आगे बढ़ाने में मदद मिलती है।

पिछले दशक में एनजीओ की संख्या में कमी का मुख्य कारण एफसीआरए (विदेशी योगदान विनियमन अधिनियम) के तहत पंजीकरण की प्रक्रिया में कठिनाइयाँ हो सकती हैं। इसके अलावा, कई एनजीओ ने वित्तीय अनियमितताओं के कारण पंजीकरण खो दिया है। इस स्थिति ने एनजीओ के कामकाज पर भी असर डाला है।

सरकारी स्तर पर इस विषय पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। हालांकि, एनजीओ के पंजीकरण में कमी और विदेशी अंशदान में वृद्धि पर चर्चा जारी है। यह मुद्दा सामाजिक कार्यकर्ताओं और नीति निर्माताओं के बीच चिंता का विषय बना हुआ है।

इस बदलाव का आम लोगों पर गहरा प्रभाव पड़ा है। एनजीओ के कार्यों में कमी से कई सामाजिक परियोजनाएं प्रभावित हुई हैं। इससे उन समुदायों को नुकसान हो सकता है, जो एनजीओ की सेवाओं पर निर्भर करते हैं।

इस बीच, कुछ अन्य संगठनों ने भी विदेशी अंशदान में वृद्धि की सूचना दी है। यह संकेत करता है कि कुछ एनजीओ अभी भी सक्रिय हैं और अपने कार्यों को जारी रखने में सक्षम हैं। हालाँकि, पंजीकरण की कमी के कारण कई एनजीओ को चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

आगे क्या होगा, यह देखना महत्वपूर्ण है। यदि एनजीओ की संख्या में कमी जारी रहती है, तो यह सामाजिक कार्यों पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। इसके अलावा, सरकार को इस स्थिति का समाधान निकालने के लिए कदम उठाने की आवश्यकता हो सकती है।

इस घटनाक्रम का महत्व इस बात में है कि यह एनजीओ के कार्यों और उनके वित्तीय स्रोतों पर एक नई दृष्टि प्रदान करता है। विदेशी अंशदान में वृद्धि और पंजीकरण में कमी, दोनों ही सामाजिक कार्यों के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण संकेत हैं। यह स्थिति नीति निर्माताओं और समाज के लिए एक चुनौती बन सकती है।

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