राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' हिंदी साहित्य के सबसे महत्वपूर्ण और प्रभावशाली कवियों में से एक हैं। उनकी कविता 'खिली भू पर जब से तुम नारि' एक अमर रचना है जो नारी के प्रति सम्मान और उसकी महत्ता को प्रकट करती है। यह कविता दिनकर की राष्ट्रीय चेतना और समाज सुधार की दृष्टि को स्पष्ट करती है।
इस कविता में दिनकर ने नारी को केवल एक लिंग के रूप में नहीं, बल्कि सभ्यता के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया है। 'खिली भू पर जब से तुम नारि' पंक्ति से ही कवि का संदेश स्पष्ट हो जाता है कि पृथ्वी पर जीवन का विकास नारी के आगमन से ही संभव हुआ है। दिनकर ने इस कविता के माध्यम से नारी को समाज की आधारशिला के रूप में स्थापित किया है।
कविता की भाषा सरल, प्रभावशाली और हृदयस्पर्शी है। दिनकर ने अपने शब्दों में नारी के विभिन्न रूपों को दर्शाया है - माता के रूप में, पत्नी के रूप में, बहन के रूप में और समाज की एक सदस्य के रूप में। उन्होंने प्रत्येक भूमिका में नारी की महत्ता और उसके योगदान को उजागर किया है। यह कविता यह संदेश देती है कि नारी के बिना किसी भी सभ्यता का विकास संभव नहीं है।
दिनकर की यह रचना सामाजिक चेतना जागृत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। आज के समय में जब नारी सशक्तिकरण और समानता की बातें की जा रही हैं, यह कविता उतनी ही प्रासंगिक है जितनी इसके रचनाकाल में थी। दिनकर ने अपनी कविता के माध्यम से समाज को यह सिखाया है कि नारी का सम्मान करना और उसे समान अधिकार देना सभ्य समाज की पहचान है।
'खिली भू पर जब से तुम नारि' कविता हिंदी साहित्य की एक मूल्यवान धरोहर है जो पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी। यह कविता केवल काव्य नहीं, बल्कि एक सामाजिक दस्तावेज़ है जो नारी के प्रति समाज के दायित्व को रेखांकित करती है।