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धरणी शब्द की गहराई: हरिवंशराय बच्चन की कविता 'मयूरी' में नृत्य और मन की मुक्ति

हिंदी साहित्य के महान कवि हरिवंशराय बच्चन की प्रसिद्ध कविता 'मयूरी' में धरणी शब्द का प्रयोग किया गया है, जो धरती और अस्तित्व का प्रतीक है। इस कविता में नृत्य और आत्मविभोर मन की अवधारणा को बच्चन ने काव्यात्मक सौंदर्य के साथ प्रस्तुत किया है। यह रचना भारतीय काव्य परंपरा में भाषा के सूक्ष्म अर्थों और मानवीय संवेदनाओं का एक उत्तम उदाहरण है।

15 अप्रैल 20261 घंटे पहलेस्रोत: शुक्रवार संवाददाता0 बार पढ़ा गया
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धरणी शब्द की गहराई: हरिवंशराय बच्चन की कविता 'मयूरी' में नृत्य और मन की मुक्ति

हरिवंशराय बच्चन हिंदी साहित्य जगत में एक महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। उनकी काव्य रचनाएं न केवल भाषागत सौंदर्य से परिपूर्ण हैं, बल्कि गहन दार्शनिक विचार भी रखती हैं। उनकी कविता 'मयूरी' में धरणी शब्द का प्रयोग एक विशेष संदर्भ में किया गया है जो पाठकों को विचार-मंथन के लिए प्रेरित करता है।

धरणी शब्द संस्कृत मूल से व्युत्पन्न है, जिसका अर्थ है धरती, पृथ्वी या वह जो धारण करती है। बच्चन की कविता में इस शब्द का प्रयोग न केवल भौतिक धरती के संदर्भ में, बल्कि आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक स्तर पर भी किया गया है। मयूरी अर्थात् मोर की मादा का नृत्य, जो प्रकृति की सुंदरता और आनंद का प्रतीक है, बच्चन के काव्य में एक रूपक बन जाता है।

'नाच, मगन-मन नाच!' की पंक्ति कविता की आत्मा है। यह मानव मन को पूर्ण मुक्ति की ओर आमंत्रित करता है, जहां सभी बंधन मुक्त हो जाते हैं। बच्चन ने नृत्य को आत्म-विस्मरण और आध्यात्मिक जागृति का माध्यम माना है। यह न केवल शारीरिक गति है, बल्कि आंतरिक चेतना का प्रकटीकरण है। धरणी पर होने वाला यह नृत्य मानव और प्रकृति के बीच एक सेतु स्थापित करता है।

बच्चन की कविता पठन यह सिद्ध करता है कि हिंदी भाषा की क्षमता कितनी विशाल है। एक साधारण शब्द 'धरणी' से लेकर नृत्य और आत्मानुभूति तक की यात्रा करती यह कविता पाठक को गहन संवेदनाओं से परिचित कराती है। प्रत्येक पंक्ति में छिपी काव्य-संपदा को समझना, हिंदी साहित्य की समृद्धि को समझना है। यह रचना आधुनिक काल में भी प्रासंगिक बनी हुई है, क्योंकि यह मानव मन की शाश्वत इच्छा - स्वतंत्रता और आनंद की कामना को व्यक्त करती है।

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