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सत्ता खोने के बाद कांग्रेस की राजनीतिक मजबूरी और भाषा की गिरती गरिमा: सुधांशु त्रिवेदी

भाजपा के वरिष्ठ नेता सुधांशु त्रिवेदी ने कांग्रेस पार्टी पर तीखा प्रहार करते हुए कहा है कि सत्ता से बाहर होने के कारण पार्टी अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता खो चुकी है। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस अपनी निरंतर विफलता के कारण राजनीतिक संवाद में भाषा की गरिमा को कम कर रही है। त्रिवेदी के अनुसार, कांग्रेस का वर्तमान राजनीतिक दौर शक्तिहीन मछली के समान संघर्ष की स्थिति में है।

15 अप्रैल 20262 घंटे पहलेस्रोत: शुक्रवार संवाददाता0 बार पढ़ा गया
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सत्ता खोने के बाद कांग्रेस की राजनीतिक मजबूरी और भाषा की गिरती गरिमा: सुधांशु त्रिवेदी

भाजपा के प्रमुख प्रवक्ता और सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने एक साक्षात्कार में कांग्रेस पार्टी की आलोचना करते हुए कहा है कि विगत चुनावों में लगातार हार के बाद कांग्रेस एक संघर्षरत राजनीतिक दल बन गई है। उन्होंने कहा कि सत्ता से विमुख होकर पार्टी ने अपनी सकारात्मक राजनीतिक पहचान खो दी है और अब केवल विरोध के स्वर में अपनी मौजूदगी दर्ज करा रही है।

त्रिवेदी ने अपने तर्क को स्पष्ट करते हुए कहा कि जिस तरह मछली पानी के बिना जीवित नहीं रह सकती, उसी प्रकार कांग्रेस जैसी पार्टी भी सत्ता की शक्ति के बिना अपनी राजनीतिक कार्यक्षमता खो देती है। उन्होंने यह भी कहा कि पार्टी की यह दुर्बल स्थिति उसकी भाषा और राजनीतिक संवाद में परिलक्षित हो रही है। उनके अनुसार, कांग्रेस की हताशा और निराशा उसके बयानों और नीतिगत दृष्टिकोण में स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं।

एक राजनीतिक दल के लिए सत्ता का महत्व अविवाद्य है, किंतु त्रिवेदी ने इस बात पर जोर दिया कि विपक्ष की भूमिका निभाते हुए भी एक पार्टी को अपनी गरिमा और नैतिक मूल्यों को बनाए रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि कांग्रेस अपने विरोध को इतना तीव्र बना गई है कि वह लोकतांत्रिक मानदंडों और भाषायी शालीनता को भी दरकिनार कर रही है। यह स्थिति न केवल पार्टी के लिए बल्कि भारतीय राजनीति के लिए भी चिंताजनक है।

आने वाले चुनावों को लेकर त्रिवेदी ने कहा कि कांग्रेस को अपनी रणनीति पुनः परिभाषित करनी होगी और सकारात्मक राजनीति की ओर लौटना होगा। उन्होंने मानना है कि केवल विरोध के आधार पर किसी पार्टी की जनता को आकृष्ट नहीं किया जा सकता। भाजपा नेता के अनुसार, भारतीय राजनीति में जनता को विकास, सुशासन और स्पष्ट दृष्टिकोण चाहिए, न कि केवल सत्ता में आने की अतृप्त इच्छा।

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