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होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव बढ़ने का खतरा, चीन के रुख से भारतीय सांसद ने जताई चिंता

चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के हाल के बयानों के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य में संघर्ष के बढ़ने की संभावना व्यक्त की जा रही है। भारतीय संसद सदस्य ने इस क्षेत्र में चीन की बढ़ती सक्रियता के प्रति चेतावनी दी है और इससे उत्पन्न होने वाली चुनौतियों पर गहरी चिंता जताई है।

14 अप्रैल 20263 घंटे पहलेस्रोत: शुक्रवार संवाददाता0 बार पढ़ा गया
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होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव बढ़ने का खतरा, चीन के रुख से भारतीय सांसद ने जताई चिंता

होर्मुज जलडमरूमध्य, जो विश्व के सबसे महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक क्षेत्रों में से एक है, में तनाव बढ़ने की संभावना को लेकर चिंता व्यक्त की जा रही है। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के हाल के बयानों ने इस क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में असमंजस की स्थिति पैदा कर दी है। भारतीय संसद के सदस्यों ने चीन की इस रुख के प्रति गंभीर आपत्ति दर्ज करते हुए इसे एशिया-प्रशांत क्षेत्र की शांति और स्थिरता के लिए खतरनाक माना है।

होर्मुज जलडमरूमध्य विश्व के तेल व्यापार का एक महत्वपूर्ण केंद्र है, जहां से प्रतिदिन लाखों बैरल तेल का परिवहन होता है। इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार का सैन्य संघर्ष या राजनीतिक तनाव न केवल मध्य पूर्व बल्कि संपूर्ण विश्व अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है। भारत जैसे तेल आयातक देशों के लिए यह क्षेत्र विशेषरूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का एक बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से आयात करता है।

भारतीय सांसद का मानना है कि चीन की बढ़ती सैन्य सक्रियता और इस क्षेत्र में उसके बढ़ते प्रभाव से न केवल होर्मुज में बल्कि समूचे हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अस्थिरता का खतरा बढ़ गया है। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि चीन इस तरह की आक्रामक नीति अपनाता है तो इससे क्षेत्रीय शक्तियों के बीच सैन्य टकराव की स्थिति भी बन सकती है। सांसद ने भारत सरकार से भी अपील की है कि वह इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के साथ मिलकर कार्य करे।

विश्लेषकों का मानना है कि शी जिनपिंग के बयान चीन की व्यापक भू-राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को दर्शाते हैं। चीन 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' के माध्यम से इस क्षेत्र में अपनी उपस्थिति मजबूत कर रहा है और इसके अलावा सैन्य आधारों की स्थापना भी कर रहा है। इससे न केवल भारत बल्कि संपूर्ण एशिया-प्रशांत क्षेत्र के लिए एक बड़ी चुनौती पैदा हो गई है। भारत को अपने रणनीतिक हितों की रक्षा करने के लिए अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के साथ समन्वय बढ़ाना होगा।

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