पूर्व अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एच.आर. मैकमास्टर ने हाल ही में ईरान और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच चल रही शांति वार्ता में पाकिस्तान की भूमिका को लेकर गंभीर आशंका व्यक्त की है। मैकमास्टर का मानना है कि पाकिस्तान इन शांति वार्ताओं में अपनी स्वतंत्र नीति अपनाने की बजाय चीन के संकेतों पर काम कर रहा है। उन्होंने सवाल उठाया है कि क्या पाकिस्तान वास्तव में स्वतंत्र रूप से निर्णय ले सकता है या यह चीन के नियंत्रण में है।
मैकमास्टर के अनुसार, पाकिस्तान की ईरान-अमेरिका वार्ता में भूमिका केवल मध्यस्थता तक सीमित नहीं है। इसके बजाय, पाकिस्तान चीन के भू-राजनीतिक हितों को आगे बढ़ाने के लिए अपनी स्थिति का उपयोग कर रहा है। यह आरोप पाकिस्तान की विदेश नीति की स्वायत्तता पर एक बड़ा सवाल है। पूर्व अमेरिकी अधिकारी का यह बयान पाकिस्तान-चीन संबंधों की गहराई को रेखांकित करता है।
चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपीईसी) परियोजना के तहत चीन ने पाकिस्तान में व्यापक निवेश किया है। इन निवेशों के कारण पाकिस्तान पर चीन का प्रभाव काफी हद तक बढ़ गया है। कई विश्लेषकों का मानना है कि आर्थिक निर्भरता ने पाकिस्तान को चीन के विदेश नीति लक्ष्यों का साधन बना दिया है। इस प्रकार की स्थिति अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक आम समस्या बन गई है।
ईरान-अमेरिका संबंध मध्य पूर्व के भू-राजनीतिक परिदृश्य में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इन वार्ताओं में विभिन्न देश अपने हितों के अनुसार भूमिका निभाते हैं। मैकमास्टर का आरोप यदि सत्य है, तो यह दर्शाता है कि पाकिस्तान इन वार्ताओं में चीन का प्रतिनिधि के रूप में काम कर रहा है। इससे पाकिस्तान की कूटनीतिक स्वतंत्रता पर प्रश्नचिह्न लग जाते हैं।
संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए यह चिंता का विषय है कि क्या शांति वार्ता में भाग लेने वाले सभी पक्ष ईमानदारी से बातचीत में लगे हुए हैं या कोई छिपे एजेंडे को आगे बढ़ा रहे हैं। पाकिस्तान की भूमिका को लेकर उठे सवालों से यह स्पष्ट होता है कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में भरोसे की कमी है। मैकमास्टर की टिप्पणी इस बात की ओर इशारा करती है कि शक्तिशाली देशों के आर्थिक प्रभाव से छोटे देशों की विदेश नीति प्रभावित होती है।