बिहार की राजनीति में एक नया अध्याय शुरू होने वाला है। मुख्यमंत्री पद के लिए किसी भी दल को आधिकारिक रूप से अपने विधायक दल का नेता चुनना होता है। यह संवैधानिक और लोकतांत्रिक परंपरा का अभिन्न अंग है जिसका पालन किया जाना अत्यावश्यक है।
समरट चौधरी के अनुसार, नीतीश कुमार के मुख्यमंत्रित्व के दौरान यह प्रक्रिया केवल एक औपचारिकता थी क्योंकि उनकी स्थिति पहले से ही सुनिश्चित थी। उसी तरह, इस बार भी राजनीतिक व्यवस्था में औपचारिकता का ही पालन किया जाएगा। हालांकि, इस बार की परिस्थितियां कुछ भिन्न हैं क्योंकि अब भाजपा को अपने विधायक दल के नेता का चयन स्वयं करना है।
यह प्रक्रिया अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें दल के सभी विधायकों की सहमति और समर्थन आवश्यक होता है। भाजपा को अपने अंदरूनी राजनीति को संभालते हुए एक मजबूत और सर्वमान्य नेता का चयन करना होगा। शिवराज सिंह चौहान की भूमिका इस चयन प्रक्रिया में महत्वपूर्ण रहेगी, जहां वे एक तरह से 'पंच' की भूमिका निभाएंगे।
भाजपा के लिए यह चुनौती केवल प्रशासनिक नहीं बल्कि राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण है। दल के विभिन्न गुटों को संतुष्ट करते हुए एक संतुलित निर्णय लेना होगा। विधायक दल के नेता के रूप में चुना गया व्यक्ति बाद में मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेगा। इसलिए, इस चयन प्रक्रिया को पारदर्शी और लोकतांत्रिक तरीके से संपन्न किया जाना चाहिए ताकि दल की आंतरिक एकता बनी रहे और कोई विवाद उत्पन्न न हो।