भारत की कृषि व्यवस्था पर नए संकट के बादल मंडराने लगे हैं। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने अपने ताजा पूर्वानुमान में चेतावनी दी है कि इस वर्ष मानसून की वर्षा सामान्य से कम होने वाली है। यह खबर देश के खेतों और किसानों के लिए एक बुरी खबर साबित हो सकती है, क्योंकि मानसून भारतीय कृषि की रीढ़ माना जाता है।
भारत में कुल खाद्यान्न उत्पादन का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा मानसूनी वर्षा पर निर्भर करता है। जून से सितंबर तक आने वाला मानसून देश के अधिकांश हिस्सों में खरीफ फसलों की बुवाई और वृद्धि के लिए महत्वपूर्ण होता है। कम वर्षा की स्थिति में धान, मक्का, कपास, दलहन और तिलहन जैसी महत्वपूर्ण फसलों की पैदावार में भारी गिरावट आ सकती है।
कृषि क्षेत्र के विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मानसून कमजोर रहता है तो सिंचाई सुविधाओं वाले क्षेत्रों को छोड़कर अधिकांश राज्यों में फसलों को सूखे का सामना करना पड़ सकता है। गांवों में किसानों की स्थिति पहले से ही कठिन है और ऐसे में मानसून की विफलता उनके लिए विनाशकारी साबित हो सकती है। बैंक कर्ज, बीज और खाद की बढ़ती कीमतें तो पहले से ही किसानों को परेशान कर रही हैं।
राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर भी इसका गहरा प्रभाव पड़ेगा। कृषि जीडीपी में महत्वपूर्ण योगदान देती है और कृषि उत्पादन में गिरावट से आर्थिक विकास की दर प्रभावित होगी। साथ ही, खाद्य वस्तुओं की आपूर्ति में कमी से महंगाई भी बढ़ने का खतरा है, जिससे आम जनता को भी परोक्ष रूप से नुकसान उठाना पड़ेगा।
इस गंभीर स्थिति से निपटने के लिए सरकार को जल संचयन, ड्रिप सिंचाई, फसल बीमा योजनाओं को मजबूत करने और किसानों को समय पर संसाधन उपलब्ध कराने जैसे उपाय करने होंगे। कृषि वैज्ञानिकों ने भी कम पानी वाली फसलों की खेती पर ध्यान देने का सुझाव दिया है।